पर्यावरण प्रदूषण का जीव जंतुओं पर प्रभाव

1.औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, अवैध खनन, विभिन्न स्वचालित वाहनों, कल-कारखानों, परमाणु परीक्षणों आदि के कारण आज पूरा पर्यावरण प्रदूषित हो गया है।

2.इसका इतना बुरा प्रभाव पड़ा है कि संपूर्ण विश्व बीमार है।पर्यावरण की सुरक्षा आज की बड़ी समस्या है।

  1. इसे हमें प्राथमिकता प्रदान करनी चाहिए तथा प्रदूषण पर्यावरण की सुरक्षा में योगदान देना चाहिए।

4.स्वच्छ एवं प्रदूषण रहित पर्यावरण आज की आवश्यकता है।

5.यदि पर्यावरण निरोग होगा तो हम मानव, जंतु और पौधे भी निरोग रहेंगे।

 

gwवायु प्रदूषण

1.पेड़-पौधों पर भी वायु प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है। वायु प्रदूषण के कारण पौधों को प्रकाश कम मिलता है जिससे उनकी प्रकाशसंश्लेषण Photosynthesis की क्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। 

2.जो पौधे घूम कोहरे के क्षेत्र में पनपते हैं, उनका विकास कम हो जाता है। उनकी पत्तियां विकृत एवं सफेद होकर गिरने लगती हैं। इसी प्रकार सौंदर्यवर्द्धक फूल एवं लताएँ वायु प्रदूषण से प्रभावित होती हैं। 

3.जहरीली गैसों के कारण फूल बदरंग होकर मुरझा जाते हैं एवं लताएँ सूख जाती हैं। 

  • gwवायु प्रदूषण के कारण पत्तियों में विद्यमान स्टोमेटा को धूम्रकण अवरूद्ध कर देते हैं, फलतः पौधे की जीवन संबंधी प्रक्रियाएँ रूक जाती हैं और पौधे क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।कुछ पौधे इस प्रकार के होते हैं जिन्हें ‘प्रदूषक सूचक‘(Indicator Plant) पौधे कहा जाता है।
  • लाइकेन एवं मास प्रजाति के पादप प्रदूषण से अत्यंत संवेदनशील होते हैं। लाइकेन सल्फर डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ने से प्रभावित होते हैं और इनकी वृद्धि कम हो जाती है। ये वायु प्रदूषण के अच्छे सूचक होते हैं अत्यधिक वायु प्रदूषित क्षेत्रों हमे लाइकेन विलुप्त हो जाते हैं।
  • लाइकेन के समान कुछ ब्रायोफाइट्स पौधे जैसे माॅस भी वायु प्रदूषण के अच्छे सूचक पौधे माने जाते हैं। यह पौधे प्रदूषण के कणों को अधिक जल्दी और ज्यादा मात्रा में अवशोषित कर लेते हैं।परिणामतः वह एक अच्छे जीव सूचक का कार्य करते हैं
  •  

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वायु प्रदूषण के परिणाम या जन-जीवन पर प्रभाव

वायु प्रदूषण से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं। कुछ भयंकर रोग भी वायु प्रदूषण के द्वारा ही होते हैं

  1. वायु में उपस्थित मिट्टी, धूल के कण, परागकण, बीजाणु आदि श्वास के रोग, जैसे- दमा (asthma), फेफड़ों का कैन्सर, एलर्जी आदि उत्पन्न करते हैं तथा वायुमण्डल को भी दूषित करते हैं।

  2. कोयला तथा पेट्रोलियम पदार्थों के जलने से निकली गैसें मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि फेफड़ों में पहुँचकर नमी से अभिक्रिया कर अम्ल बनाती हैं, जो श्वसन तन्त्र में घाव कर देते हैं।

नाइट्रोजन के ऑक्साइड फेफड़ों, हृदय तथा आँखों के रोग पैदा करते हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड रुधिर में मिलकर ऑक्सीजन के वाहक हीमोग्लोबिन से अभिक्रिया करके ऑक्सीजन संवहन के कार्य को प्रभावित करती है तथा थकावट व मानसिक विकार पैदा करती है।

gw3. वातावरण में फ्लुओराइड (fluoride) की मात्रा बढ़ने से पत्तियों के सिरों व किनारों के ऊतक नष्ट होने लगते हैं इस स्थिति को हरिमहीनता (chlorosis) या ऊतक क्षय (necrosis) कहते हैं। फलस्वरूप पत्तियाँ नष्ट होने लगती हैं, प्रकाश संश्लेषण रुक जाता है और ऑक्सीजन की उत्पत्ति पर प्रभाव पड़ता है।

gw4. कुछ प्रदूषक वातावरण में आने पर अन्य पदार्थों से क्रिया करके द्वितीयक प्रदूषकों (secondary pollutants) के रूप में अनेक प्रकार के विषैले पदार्थ बना लेते हैं जो स्वास्थ्य पर गम्भीर तथा हानिकारक प्रभाव डालते हैं; जैसे- स्वचालित निर्वातक में निकलने वाले अदग्ध हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड सूर्य के प्रकाश में प्रतिक्रिया करके प्रकाश संश्लेषी स्मॉग (photosynthetic smog) का निर्माण करते हैं।

 इनमें पैरॉक्सी ऐसीटिल नाइट्रेट (PAN) तथा ओजोन होते हैं। इस प्रकार बनने वाले पदार्थ विषैले होते हैं। इनका प्रभाव विशेषकर आँखों तथा श्वसन पथ पर होता है तथा साँस लेने में कठिनाई हो जाती है। पौधों के लिए PAN अत्यधिक हानिकारक है तथा इसके प्रभाव से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया अवरुद्ध हो जाती है।

दूसरी ओर ओजोन पत्तियों में श्वसन तेज कर देती है। इस प्रकार, भोजन की कमी से पौधे नष्ट हो जाते हैं।

gw4. कुछ प्रदूषक वातावरण में आने पर अन्य पदार्थों से क्रिया करके द्वितीयक प्रदूषकों (secondary pollutants) के रूप में अनेक प्रकार के विषैले पदार्थ बना लेते हैं जो स्वास्थ्य पर गम्भीर तथा हानिकारक प्रभाव डालते हैं; जैसे- स्वचालित निर्वातक में निकलने वाले अदग्ध हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड सूर्य के प्रकाश में प्रतिक्रिया करके प्रकाश संश्लेषी स्मॉग (photosynthetic smog) का निर्माण करते हैं।

 इनमें पैरॉक्सी ऐसीटिल नाइट्रेट (PAN) तथा ओजोन होते हैं। इस प्रकार बनने वाले पदार्थ विषैले होते हैं। इनका प्रभाव विशेषकर आँखों तथा श्वसन पथ पर होता है तथा साँस लेने में कठिनाई हो जाती है। पौधों के लिए PAN अत्यधिक हानिकारक है तथा इसके प्रभाव से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया अवरुद्ध हो जाती है।

दूसरी ओर ओजोन पत्तियों में श्वसन तेज कर देती है। इस प्रकार, भोजन की कमी से पौधे नष्ट हो जाते हैं।

gw5. विभिन्न प्रकार की धातुओं के कण घातक रोगों को जन्म देते हैं। ये सब विषैले होते हैं। सीसा (lead) तन्त्रिका तन्त्र तथा वृक्कों के रोगों को उत्पन्न करता है। कैडमियम रुधिर चाप बढ़ाता है। और हृदय तथा श्वसन सम्बन्धी रोगों का कारण है। लोहे तथा सिलिका के कण भी फेफड़ों की बीमारियाँ पैदा करते हैं।


  1. फ्लुओराइड हड्डियों तथा दाँतों पर प्रभाव डालते हैं। इनसे पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते हैं और पौधों की वृद्धि ठीक नहीं होती है।
  2. जन्तुओं पर प्रभाव

    उपर्युक्त के अनुसार, वायु प्रदूषक अन्य जन्तुओं पर भी अहितकर प्रभाव उत्पन्न करते हैं। पशुओं में फेफड़ों की अनेक बीमारियाँ, धूलकणों, सल्फर डाइऑक्साइड आदि से पैदा होती हैं। इसी प्रकार कार्बन मोनोऑक्साइड से पशुओं की मृत्यु तक हो जाती है। गाय, बैल तथा भेड़े, फ्लुओरीन के प्रति अत्यधिक संवेदी हैं। फ्लुओरीन घास तथा अन्य चारों में एकत्रित हो जाती है। पशु जब इसको खाते हैं। तो ये पदार्थ उनके शरीर में पहुँचकर अस्थियों तथा दाँतों पर प्रभाव डालते हैं। कैडमियम श्वसन विष है, यह हृदय को हानि पहुँचाता है। सुअर वायु प्रदूषण से कम प्रभावित होता है।

  3. gwपौधों पर प्रभाव

    वायु प्रदूषण का पौधों पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है। सामान्यत: वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों की परतें होने के कारण सूर्य के प्रकाश की पौधों तक पहुँच कम हो जाने से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में कमी आती है।

     धूल तथा अन्य कण पत्तियों पर जमकर उनकी कार्यिकी पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। उनमें श्वसन, प्रकाश संश्लेषण तथा वाष्पोत्सर्जन क्रिया की दर घट जाती है। सल्फर डाइऑक्साइड पत्तियों में क्लोरोफिल (chlorophyll) को नष्ट कर देती है।

    ओजोन की उपस्थिति से श्वसन तेज हो जाता है, भोजन की आपूर्ति नहीं हो पाती अतः पौधे की मृत्यु हो सकती है।

     इसी प्रकार, विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म कण; जैसे- सीसा, कैडमियम, फ्लुओराइड, ऐस्बेस्टस आदि वृद्धि रोकने वाले, ऊतकों को नष्ट करने वाले आदि प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इनके प्रभाव से पत्तियाँ आंशिक रूप से अथवा पूर्ण रूप से झुलस (जलना) जाती हैं।

  4. gwअन्य आर्थिक प्रभाव

    सल्फर डाइऑक्साइड व कार्बन डाइऑक्साइड आदि से बने अम्ल; जैसे-सल्फ्यूरिक अम्ल, कार्बनिक अम्ल हमारी इमारतों, वस्त्रों आदि पर अत्यन्त हानिकारक प्रभाव डालते हैं। भवनों पर सीसे (lead) का रोगन हाइड्रोजन सल्फाइड के प्रभाव से काला पड़ जाता है। सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स आदि भवनों का संक्षारण भी करते हैं। मथुरा के तेल शोधक कारखाने से निकली हुई गैसें, कहते हैं कि विश्व प्रसिद्ध आगरा के ताजमहल के संगमरमर को काफी हानि पहुँचा रही हैं। इसी प्रकार, दिल्ली के लाल किले के पत्थरों को थर्मल विद्युत गृह से निकली गैसों ने काफी हानि पहुँचायी है।

  5. gwअन्य आर्थिक प्रभाव

    सल्फर डाइऑक्साइड व कार्बन डाइऑक्साइड आदि से बने अम्ल; जैसे-सल्फ्यूरिक अम्ल, कार्बनिक अम्ल हमारी इमारतों, वस्त्रों आदि पर अत्यन्त हानिकारक प्रभाव डालते हैं। भवनों पर सीसे (lead) का रोगन हाइड्रोजन सल्फाइड के प्रभाव से काला पड़ जाता है। सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स आदि भवनों का संक्षारण भी करते हैं। मथुरा के तेल शोधक कारखाने से निकली हुई गैसें, कहते हैं कि विश्व प्रसिद्ध आगरा के ताजमहल के संगमरमर को काफी हानि पहुँचा रही हैं। इसी प्रकार, दिल्ली के लाल किले के पत्थरों को थर्मल विद्युत गृह से निकली गैसों ने काफी हानि पहुँचायी है।

  6. gwओजोन कवच पर प्रभाव

    ओजोन कवच जो पृथ्वी के वायुमण्डल के बाहरी भाग में, क्षोभ मण्डल (troposphere) जिसमें हम रहते हैं, के बाहर व समताप मण्डल (stratosphere) के भीतरी परत के रूप में है तथा समताप मण्डल का ही भाग मानी जाता है, 15 से 30 किमी ओजोन गैस (O3) की मोटी परत के रूप में स्थित है, पृथ्वी की सुरक्षा विशेषकर सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (ultraviolet) किरणों आदि से करता है। वायु प्रदूषण के कारण विभिन्न प्रकार के प्रदूषक इस परत को हानि पहुँचा सकते हैं। उदाहरण के लिए समताप मण्डल में क्लोरीन गैस के पहुंचने से ओजोन की मात्रा में कमी आ जाती है। क्लोरीन का एक परमाणु, 1,00,000 ओजोन अणुओं को नष्ट कर देता है।


    सूर्य से प्राप्त पराबैंगनी किरणों, जिन्हें ओजोन परत रोकती है, से सीधा सम्पर्क मनुष्य, अन्य जीव-जन्तु, वनस्पति आदि में रोग प्रतिरोधक क्षमता का अवक्षय करता है। मनुष्य में त्वचा का कैन्सर, आँखों में मोतियाबिन्द, अन्धापन आदि रोगों की वृद्धि होती है। समुद्री तथा स्थलीय जीव-जन्तु, कृषि उपज, वनस्पति एवं खाद्य पदार्थों पर भी इन पराबैंगनी किरणों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इनसे भूपृष्ठीय तापमान बढ़ने से विश्वतापन (global warming) का खतरा है जिससे जलवायु परिवर्तित हो जायेगी।

निम्नलिखित पर आलोचनात्मक टिप्पणी लिखें –

 

सुपोषण (Utrofication)

जैव आवर्धन (Biological Magnification)

भौमजल (भूजल) का अवक्षय और इसकी पुनःपूर्ति के तरीके।

उत्तर

  1. सुपोषण (Eutrophication) – अकार्बनिक फॉस्फेट एवं नाइट्रेट के जलाशयों में एकत्र होने की क्रिया को सुपोषण कहते हैं। सुपोषण झील का प्राकृतिक काल-प्रभावन दर्शाता है, यानि झील अधिक उम्र की हो जाती है। यह इसके जल की जैव समृद्धि के कारण होता है। तरुण झील का जल शीतल और स्वच्छ होता है। समय के साथ-साथ इसमें सरिता के जल के साथ पोषक तत्त्व, जैसे-नाइट्रोजन और फॉस्फोरस आते रहते हैं जिसके कारण जलीय जीवों में वृद्धि होती रहती है। जैसे-जैसे झील की उर्वरता बढ़ती है वैसे- वैसे पादप और प्राणी बढ़ने लगते हैं। जीवों की मृत्यु होने पर कार्बनिक अवशेष झील के तल में बैठने लगते हैं। सैकड़ों वर्षों में इसमें जैसे-जैसे सिल्ट एवं जैव मलबे का ढेर लगता है वैसे-वैसे झील उथली और गर्म होती जाती है। उथली झील में कच्छ (marsh) पादप उग आते हैं और मूल झील बेसिन उनसे भर जाता है।

 

मनुष्य के क्रियाकलापों के कारण सुपोषण की क्रिया में तेजी आती है। इस प्रक्रिया को त्वरित सुपोषण कहते हैं। इस प्रकार झील वास्तव में घुट कर मर जाती है और अन्त में यह भूमि में परिवर्तित हो जाती है।

 

  1. जैव आवर्धन (Biological Magnification) – जैव आवर्धन का तात्पर्य है, क्रमिक पोषण स्तर पर आविषाक्त की सान्द्रता में वृद्धि का होना। इसका कारण है जीव द्वारा संगृहीत आविषालु पदार्थ उपापचयित या उत्सर्जित नहीं हो सकता और इस प्रकार यह अगले उच्चतर पोषण स्तर पर पहुँच जाता है। ये पदार्थ खाद्य श्रृंखला के विभिन्न पोषी स्तरों (trophic levels) के जीवों में धीरे-धीरे संचित होते रहते हैं। खाद्य श्रृंखला में इन्हें सबसे पहले पौधों द्वारा प्राप्त किया जाता है। पौधों से इन पदार्थों को उपभोक्ताओं द्वारा प्राप्त किया जाता है। उद्योगों के अपशिष्ट जल में प्रायः विद्यमान कुछ विषैले पदार्थों में जलीय खाद्य श्रृंखला जैव आवर्धन कर सकते हैं।

 

यह परिघटना पारा एवं D.D.T. के लिए सुविदित है। क्रमिक पोषण स्तरों पर D.D.T: की सान्द्रता बढ़ जाती है। यदि जल में यह सान्द्रता 0.003 ppb से आरम्भ होती है तो अन्त में जैव आवर्धन के द्वारा मत्स्यभक्षी पक्षियों में बढ़कर 25 ppm हो जाती है। पक्षियों में D.D.T. की उच्च सान्द्रता कैल्शियम उपापचय को नुकसान पहुँचाती है जिसके कारण अंडकवच पतला हो जाता है और यह समय से पहले फट जाता है जिसके कारण। पक्षी-समष्टि की संख्या में कमी हो जाती है।

 

  1. भौमजल का अवक्षय और इसकी पुनः पूर्ति के तरीके (Ground- water Depletion and Ways for its Replenishment) – भूमिगत जल पीने के लिए अधिक शुद्ध एवं सुरक्षित है। औद्योगिक शहरों में भूमिगत जल प्रदूषित होता जा रहा है। अपशिष्ट तथा औद्योगिक अपशिष्ट बहाव जमीन पर बहता रहता है जोकि भूमिगत जल प्रदूषण के साधारण स्रोत हैं। उर्वरक तथा पीड़कनाशी, जिनका उपयोग खेतों में किया जाता है, भी प्रदूषक का कार्य करते हैं। ये वर्षा-जल के साथ निकट के जलाशयों में एवं अन्तत: भौमजल में मिल जाते हैं। अस्वीकृत कूड़े के ढेर, सेप्टिक टंकी एवं सीवेज गड्ढे से सीवेज के रिसने के कारण भी भूमिगत जल प्रदूषित होता है।

 

वाहितमल जले एवं औद्योगिक अपशिष्टों को जलाशयों में छोड़ने से पहले उपचारित करना चाहिए जिससे भूमिगत जल प्रदूषित होने से बच सकता है।

अण्टार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र क्यों बनते हैं? पराबैंगनी विकिरण के बढ़ने से हमारे ऊपर किस प्रकार प्रभाव पड़ेंगे?

उत्तर

हालाँकि ओजोन अवक्षय व्यापक रूप से होता है, लेकिन इसका असर अण्टार्कटिक क्षेत्र में खासकर देखा गया है। यहाँ जगह-जगह पर ओजोन परत में इतनी कमी पड़ जाती है कि छिद्र को आभास होने लगता है और इसे ओजोन छिद्र (Ozone hole) की संज्ञा दी जाती है। कुछ सुगन्धियाँ, झागदार शेविंग क्रीम, कीटनाशी, गन्धहारक आदि डिब्बों में आते हैं और फुहारा या झाग के रूप में निकलते हैं। इन्हें ऐरोसोल कहते हैं। इनके उपयोग से वाष्पशील CFC वायुमण्डल में पहुँचकर ओजोन स्तर को नष्ट करते हैं। CFC का व्यापक उपयोग एयरकण्डीशनरों, रेफ्रिजरेटरों, शीतलकों, जेट इंजनों, अग्निशामक उपकरणों, गद्देदार फोम आदि में होता है। ज्वालामुखी, रासायनिक उर्वरक, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, सवाना तथा अन्य वन-वृक्षों के जलने से ओजोन की परत को क्षति होती है। फ्रिऑन सबसे अधिक घातक क्लोरोफ्लोरोकार्बन है जो ओजोन से प्रतिक्रिया कर उसका अवक्षय करता है।

 

पराबैंगनी- बी की अपेक्षा छोटे तरंगदैर्ध्य युक्त पराबैंगनी विकिरण पृथ्वी के वायुमण्डल द्वारा लगभग पूरा का पूरा अवशोषित हो जाता है। बशर्ते कि ओजोन स्तर ज्यों-का-त्यों रहे लेकिन पराबैंगनी-बी DNA को क्षतिग्रस्त करता है और उत्परिवर्तन को बढ़ाता है। इसके कारण त्वचा में बुढ़ापे के लक्षण दिखते हैं। इससे विविध प्रकार के त्वचा कैंसर हो सकते हैं। इससे हमारी आँखों में कॉर्निया का शोथ हो । जाता है जिसे हिम अंधता, मोतियाबिंद आदि कहा जाता है।



प्रश्न 1.

जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग पर टिप्पणी लिखिए। 

जैव- रासायनिक ऑक्सीजन माँग (Biochemical Oxygen Demand = BOD) जल में कार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों की अधिकता से उनके विघटन की दर व ऑक्सीजन की खपत बढ़ जाती है, जिससे जल में घुलित ऑक्सीजन (dissolve Oxygen =DO) की मात्रा कम हो जाती है। ऑक्सीजन की आवश्यकता का सीधा सम्बन्ध जल में कार्बनिक पदार्थों की बढ़ती मात्रा से है। इसे जैव-रासायनिक ऑक्सीजन माँग (BiochemicalOxygen Demand =BOD) के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। BOD, ऑक्सीजन की उस मात्रा का मापन है जो जल के एक नमूने में वायवीय जैविक अपघटकों (aerobic decomposers) द्वारा जैव क्षयकारी (biodegradable) कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के लिए आवश्यक है। घर की गन्दी नाली से निकले गन्दे जल की BOD value 200 – 400 ppm ऑक्सीजन (एक लीटर गन्दे जल के लिये) होती है। औद्योगिक संस्थानों से निकले कचरे के कारण BOD का मान 2500 ppm तक हो जाता है। पीने के स्वच्छ जल की BOD 1 ppm से कम होनी चाहिये।

 

प्रश्न 2. रेडियोऐक्टिव अपशिष्ट प्रबन्धन पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर

रेडियोऐक्टिव अपशिष्टों को नष्ट करने के लिए सबसे सरल एवं उचित उपाय यह है कि इन अपशिष्टों को भूमि में लगभग 500 मीटर या और अधिक गहराई में गाड़ दिया जाये परन्तु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वह स्थान जहाँ पर अपशिष्ट को गाड़ा जा रहा हो मानव आबादी से बहुत दूर हो।

परमाणु परीक्षण को तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो ये परीक्षण भूमि के नीचे गहराई में किये जाने चाहिए।

 

प्रश्न 3. ग्रीन हाउस प्रभाव पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर

वायु प्रदूषण का पृथ्वी के तापक्रम पर प्रभाव

ग्रीन हाउस प्रभाव वायुमण्डल के सामान्य संगठन तथा पर्यावरण के सामान्य अवस्था में होने पर सूर्य की किरणों से गर्म होने वाली पृथ्वी अधिकतर ऊष्मा को वापस लौटा देती है जो बाह्य वायुमण्डल (exosphere) व अन्तरिक्ष में वापस विसरित हो जाती है। इस प्रकार पृथ्वी का जीवमण्डल क्षेत्र ऊष्मा से बचा रहता है। किन्तु पिछले कुछ दशकों से पर्यावरण में कुछ गैसों; विशेषकर कार्बन डाइऑक्साइड आदि की मात्रा बढ़ने से पृथ्वी पर तापमान बढ़ने लगा है।

 

पृथ्वी पर कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता से बनी हुई परत ग्रीन हाउस के शीशे की परत के समान कार्य करती है अर्थात् यह सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने देने के लिए तो पारदर्शक (transparent) होती है परन्तु पृथ्वी से गर्म वायु जब ऊपर उठती है तो यह उसके लिए अपारदर्शक (opaque) दीवार का काम करती है, फलस्वरूप पृथ्वी का तापक्रम बढ़ जाता है। कार्बन डाइऑक्साइड का यही प्रभाव ग्रीन हाउस प्रभाव (green house effect) कहलाता है। अन्य गैसें; जैसे- क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (CFCs), नाइट्रोजन के ऑक्साइड; जैसे- (NO2), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), अमोनिया (NH3), मेथेन (CH4) आदि भी इसी प्रकार का प्रभाव उत्पन्न करने में सहायक होती हैं।

 

ग्रीन हाउस प्रभाव के प्रभाव

ग्रीन हाउस प्रभाव त्वचा (skin) तथा फेफड़ों (lungs) के रोगों में वृद्धि करने में सहायक है। इसके अन्य भयंकर प्रभावों में ताप के कारण पर्वतीय चोटियों तथा धुवों (poles) पर बर्फ के पिघलने से समुद्र तल में वृद्धि, तटीय भूमि (coastal land) तथा नगरों आदि के पानी में डूबने की सम्भावना में अत्यधिक वृद्धि होती जाती है।

 

ग्रीन हाउस प्रभाव से पृथ्वी का ताप बढ़ने अर्थात् भूमण्डलीय ऊष्मायन (global warming) के अतिरिक्त पर्यावरण विभिन्न प्रकार से प्रभावित होता है। इससे पौधों में वाष्पोत्सर्जन में वृद्धि, वर्षा (rainfall) में वृद्धि, किन्तु मृदा नमी (soil moisture) का ह्रास होता है।

 

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